सपनों में जो आता रहता
आप वो अपना गाँव कहाँ है?
कलकल करती नदी खो गई
कहाँ गये तालाब कमल के
तनमन को जो शीतल करदें
सोते मीठे-मीठे जल के
पथ की थकन मिटाने वाली
पीपल की वो छाँव कहाँ है
धूप खिली खेतों पर लेकिन
लगती है कुछ धुंधलाई सी
हुई प्रदूषित हवा ,धुयें की
हलकी बदली है छाई सी
चिड़ियों में वो चहक नहीं है
अब मुंडेर के काग कहाँ हैं
बखरी-बखरी भरी हुई पर
मुट्ठी फिर भी भिंची हुई हैं
मन से मन के बीच अजानी
रेखायें सी खिंची हुई हैं
चटक रहीं कच्ची दीवारें
अपनेपन का ताग कहाँ है
-डॉ मधु प्रधान
कानपुर
