अस्तित्व का विस्तार: स्त्री और पृथ्वी
पृथ्वी सा धैर्य लिए, वह सृजन की मूक कथा लिखती है,
हर आघात सहकर भी, वह अंकुर की अभिलाषा रखती है।
उसकी देह मात्र मिट्टी नहीं, ब्रह्मांड का द्वार निराला है,
जहाँ काम की अग्नि को, ममता के जल ने सदा पाला है।
जैसे हल की तीखी फाँस से, वसुधा का अंतस खुलता है,
वैसे ही मिलन की वेला में, पौरुष का दर्प पिघलता है।
यौन वहाँ वासना नहीं, एक आदिम यज्ञ की वेदी है,
जहाँ आत्मा विलीन होती, वह देह मुक्ति की श्रेणी है।
वह गर्त भी है, वह शिखर भी, वह ऊष्मा का ही सागर है,
जैसे तपती धरा बुझाती, सावन की प्यासी गागर है।
उसके रजों के रंग में, नव-सृजन का बीज पनपता है,
जैसे काली मिट्टी के भीतर, जीवन गुपचुप कल्पता है।
दोहन और खनन के बीच, वह अविचल मौन का प्रतीक है,
प्रेम और समर्पण ही, उसकी रग-रग की सच्ची ऋचा है।
वह रिक्त होकर भी पूर्ण है, वह शून्य होकर भी अनंत है,
पृथ्वी की कोख सा उसमें, छिपा शाश्वत वसंत है।
अंततः सब लय होते हैं, उसी मृण्मयी छाया में,
सृष्टि का सार छिपा बैठा, उसकी पावन काया में।
-योगी नारायण नाथ
इटहरी सुनसरी, नेपाल
