सभी ने देखे हैं दिन
मुफ़लिसी के,
सभी के पास आँखें हैं।
दीवारों पर सजे हैं
महँगे ख़्वाबों के नक़्शे,
पर पहने तन्हाई का
लिबास, आँखें हैं।
बड़े मकानों में अब सन्नाटा
शोर करता है,
रिश्तों के खालीपन का
इतिहास, आँखें हैं।
समेट रखा है
एक समंदर सभी ने अपने भीतर,
जहाँ सहमी सी,
बदहवास आँखें हैं।
न जाने कौन सी कमाई
कर रहे हैं बेटा-बेटी,
हर घर में अब
दो उदास आँखें हैं
-कंचन तिवारी कशिश
जौनपुर (उत्तरप्रदेश)
