“स्वानुभूति”
“स्वयं से मिलना”
उधार का ज्ञान किताब है, स्वानुभूति कलेजा है। किताब रास्ता दिखाती है, कलेजा उस रास्ते पर चलवाता है। किताब पढ़कर ज्ञानी बनते हैं, स्वानुभूति से इंसान बनते हैं। बिना स्वानुभूति के लेखन कैसा? बिना स्वानुभूति का सृजन, बिना खुशबू का फूल है। दिखेगा, पर महकेगा नहीं।
बिना स्वानुभूति का उपदेश, बिना घाव का वैद्य है, नुस्खा तो लिख देगा, दर्द नहीं समझेगा। बिना स्वानुभूति का संत, बिना आग में तपा सोना है। चमकेगा नहीं।स्वानुभूति सबसे निजी है, मेरा दर्द तुम नहीं जी सकते।
और सबसे सार्वभौमिक भी है, जो मैंने जिया, वही पढ़कर तुम रो दोगे। मीरा ने जहर पिया “मेरा था, पर सदियों से “सबका” हो गया। यही स्वानुभूति का जादू है।
“मैं बाजार में नहीं बिकती, मैं दरबार में नहीं मिलती हूँ। मैं डिग्री से नहीं मिलती, मैं ठोकरों से मिलती हूँ।
मुझे पढ़ा नहीं जाता, मुझे जिया जाता है। जो मुझे जी लेता है, वो लेखक नहीं रहता- वो ‘केवल’ हो जाता है।” (हे री सखी मैं तो ऐसी भई, जित देखूं तित साँवरिया, या जहर के जाम मे श्याम के दर्शन हुआ करते हैं, कोई स्वयं अनुभूति करके देख ले, इस दौर में भी मीरा की तरह!)
स्वानुभूति अर्थात संघर्ष से सृजन, शूल से शीतलता, संकट से सिद्धि।
जो स्वयं से नहीं मिला, वो कुंदन नहीं बना। जो नहीं टूटा, वो तराशा भी नहीं गया। जो नहीं गिरा, वो शिखर नहीं चढ़ा। “जान” से “जहान” नहीं बनता मित्रों। “जानकर” “जहान” बनता है। और “जानना” तभी होता है, जब “स्वानुभूति” होती है।
-आनंद पांडेय “केवल”
