आत्मानुभूति

(तुमको सिर्फ़ ग़ज़ल कह दूं तो……???)

नगमो-नज़ाकत,शेरो-शरारत, कवित, रासो का क्या होगा जी?
तुमको ग़ज़ल कहूँ तो बाकी, अहसासों का क्या होगा जी?

सिसक रहा मकता, मौजूॅं पर, शब्दों में गरमाहट कम क्यों?
मिसरा अटक-अटक कर बढ़ता,आँखों में शरमाहट नम क्यों?
महज मौन का मान बढ़ा कर, तुम मूरत बन जाओगे तो!
मतवाले, मदमस्त मदन के,मधुमासों का क्या होगा जी?

संझानो की सरगम से ही,सरस रागों की सरिता बहती।
संतापों की सिहरन को ही,शब्दों में तो कविता कहती।
सभी गीत ग़र, गुमसुम होकर, ग़म के गहन, गरल को पीले!
प्रेम पगाये परवानों के, परिहासों का क्या होगा जी?

नौसिखिये, नादान, बेचारे, नयन-नजाकत, को क्या जाने?
महज,मुस्कराहट के मारे, मनभावों को क्या पहचाने?
मोहक, मनहारी मूरत जब,निज मंदिर में बंद रहे तो!
दर्शन के प्यासे नैनों की, अरदासों का क्या होगा जी?

माना के रसराज तुम्हारा, लेकिन करुणा जीवन रस है।
वीर,वीभत्स, भयानकता के, रोद्र-रूप से, जग में जस है।
सरल, शान्त-चितवन की मलिका, अदभुद हो भावों में लेकिन!
सहज हास्य से जग में गूँजित,अठ्ठासों का क्या होगा जी?

तुम्हीं कविता, तुम्हीं रुबाई, तुम्हीं छंद की तरुणाई हो।
कहीं प्रेमिका, कहीं मातमन, कहीं ठुनकती परजाई हो।
कलम-कामिनी, कम काजल से, ग़र कजरारे नैन करें तो!
वहम बेचते, बनजारों के,विश्वासों का क्या होगा जी?

-सत्येन्द्र मण्डेला

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