अपने ही घर की दीवारों में,
जब दरारें बोल उठती हैं,
तब समझ आता है अक्सर
चोटें बाहर से नहीं, भीतर से होती हैं।
जिसे समझा था अपना साया,
वही धूप में छोड़ गया,
जिसे दिल का राज बताया,
वही राज़ को तोड़ गया।
आस्तीन में पाला था जिसे,
वो सांप बनकर डस गया,
मीठे शब्दों की ओट में,
वो जहर दिल में बस गया।
अब सीख लिया है हमने भी,
हर मुस्कान सच्ची नहीं होती,
हर अपना अपना नहीं होता,
हर नज़दीकी अच्छी नहीं होती।
दर्द मिला तो क्या हुआ,
ये अनुभव भी खास है,
अब पहचान लेंगे चेहरे
कौन अपना, कौन नकाब है।
-ऋतु कोचर,कटंगी
