“गौरैया की प्यास”
खतम हुई तलाश ओ गौरैया
छत पर मेरी आ जाना
रखा है भर पाषाण पात्र जल
आ पी कर प्यास बुझा लेना
पात्र बड़ा रखा है मैंने
मन भर खूब फुदकना तुम
सूने से मेरे आँगन में
आ कर खूब चहकना तुम
ऊँचे आम के पेड़ पर मैंने
इक डब्बा काट के टांगा है
जोड़कर तिनके घास-फूस
घोंसला अपना बना लेना तुम
देना उसमें अंडे अपने
बिल्कुल भी तुम मत घबराना
बिखरे मिलेंगे
दाने तुमको आसपास ही
तलाश में दूर नहीं होगा जाना
नन्हें चूजों की चिंता में
परेशान नहीं होना होगा
ओ गौरैया तुम
बात मेरी ये सुन लेना
अपनी चहक से तुम
मेरा भी मन हर लेना
लौट आओ मेरे आँगन में
वही रौनके भर दो तुम
कोलाहल और शोर गुल को
कलरव से अपने ढक दो तुम
-स्मृति गुप्ता
जबलपुर
