वो इम्तेहान ही तो सिखाते हैं,
हमें जीने का सबक दे जाते हैं।
पुरुषार्थ देखकर वो,
दीपक-सा जल जाते हैं।
बिखेरकर अपनी रोशनी,
समीर संग लड़ जाते हैं।
पाने की चाह है,
छूना आसमाँ है।
कहे वो, थका नहीं,
चला वो पथ, रुका नहीं।
वो शूल पाँव में पड़े,
थे घाव कुछ बड़े-बड़े।
वो मन में विश्वास लिए,
जला वो ज्योत, थका नहीं।
अड़ा वो, अडिग रहा सदा,
चला वो राह, रुका नहीं।
कभी वो पथ में छला गया,
बहुरूपियों से छला गया।
संघर्ष का भी क्या दौर है,
आज कुछ, कल कुछ और है।
डरना नहीं, चलता रहा,
छलियों से लड़ता रहा।
गिरा, उठा, सँभलता रहा,
पुरुषार्थ-पथ पर चलता रहा।
ले मन में आस, विश्वास था,
पथिक वो पथ से भटका नहीं।
आए लाख तूफ़ाँ, आँधियाँ,
मगर डगर से भटका नहीं।
फिर सफलता मिली उसे,
वो राह हार नहीं, जीत थी।
वो इम्तेहान ही तो सिखाते हैं,
जीने का सबक दे जाते हैं।
-प्रज्ञा सुमेध जायसवाल
नागपुर
