“बुझे दीप का वज़न”
गाँव के पीपल तले चौपाल का दीया, रामू की पुस्तैनी विरासत था। दादा की काँपती उँगलियाँ जलाती थीं, फिर पिता की सख्त हथेलियाँ। रामू को लगता, “बस एक मिट्टी का दिया इसमें क्या धरा है?”
मंगल का मेला सजा था। ढोल-मंजीरे की धुन कान में पिघलती थी। रामू ने दिया हाथ में लिया, फिर रख दिया। पिता ने पीछे से आवाज़ दी, “बेटा, मेला उतना जरूरी नहीं, इस दिये की लौ का जलना ज़रूरी है इस अंधेरी रात में।” रामू हँसकर बोला, “एक दिन ना जलाऊँ तो क्या जायेगा, काका? पहाड़ तो नहीं टूट पड़ेगा।”
रात काली थी। बादल गरज रहे थे। चौपाल का कोना अँधेरे में डूब हुआ था। उसी अँधेरे को चीरते वैद्य जी आ रहे थे – गोद में तड़पती प्रसूता, साथ में बूढ़ा ससुर। रास्ता न दिखाई देने की वजह से बैलगाड़ी का पहिया गड्ढे में धँसा। चीख निकली… फिर सन्नाटा।
सुबह रामू लौटा। चौपाल पर पिता नहीं थे। पीपल की जड़ में बैठे थे, गोद में बुझा हुआ दिया लिए। आँखों से गंगा-जमुना बह रही थी। काँपते हाथों से दिया रामू को थमाकर बोले, “ले बेटा… ये मिट्टी का नहीं, भरोसे का दिया है। तेरे ‘एक दिन’ की कीमत… एक माँ और उसकी कोख ने चुका दी।”
रामू ने पिता के पैर पकड़ लिए। उस दिन के बाद मेला आए, तूफान आए, बुखार आए… रामू का दिया कभी नहीं बुझा।
(उत्तरदायित्व वजन नहीं होता , वो किसी की आखिरी उम्मीद होता है।) उसे उठा लें, तो हम इंसान बन जाएं।
-आनंद पाण्डेय “केवल”
