उलझन


विगत आठ महीनों से काम वाली बाई ने बिना कुछ कहे, आना बंद कर दिया।
उसके आने न आने के बहाने के बीच कुछ बातें तो समझ आने लगीं कि अब उसकी हर समस्या का निदान बीस वर्षों में हो गया।
पहले तो वह तलाक की वजह से त्रस्त होकर कोर्ट कचहरी से लेकर निर्णय तक सहयोग लेती फिर बच्चों की परवरिश को लेकर उसके बाद खुद के लिए आवास की समस्या का हल भी निकलवा ली। नगद राशि उधार में भी जब तब श्रीमान जी से लेती ही रही। देते भी रहे। उसकी जरूरतें समाप्त हो चुकीं इस बीस वर्ष में वह हमारी जरूरत बन गई। तब अवसरवादिता का नमूना देखने मिला। मान मनौव्वल के बाद न आने के बहुत बहाने हुए। इस उलझन में समय बीतता रहा सिर दर्द बढ़ता गया।
इस गाँव में किसी के घर लोग जूठन माँजने का काम नहीं करते। जो लगे सगे होते हैं वे एक दूसरे का भले सहयोग कर दें।
मजदूरी करने सब आते-जाते हैं उसमें कुछ घंटे में नगद राशि मिल गई और छुट्टी।
उस पर सरकारी मुफ्त कम कीमत वाला राशन, आवास विधवा परित्यकता निराश्रित पेंशन जैसी योजनाओं का लाभ। फिर महतारी वंदन, आयुष्मान कार्ड, स्मार्ट कार्ड, बचे खुचे रोजगार गारंटी योजना जो नीम चढ़ा उस पर करेला वाली बात फिट होती है।
काम कुछ करो हर दिन तीन सौ (२८०) रूपये मिलना ही मिलना है। तो काहे जायें? किसी घर में दो हजार तीन हजार माह के हिसाब से भला।
अब इस बड़ी उलझन का क्या कहें बहन? जीवन है तो उलझन है उलझन हो तो चिंता सवार है कब सुलझे न सुलझे तो बस घिरे रहते हैं तनाव में।
यह सोचते बस कभी चिंता कभी अनिद्रा कभी चिड़चिड़ाहट और क्रोध में काम के बोझ से शरीर और मन दोनों निढाल।
उलझन जब तक न सुलझे समझ लिए कि जीवन की रील उलझ गई जिसे धीरज से सहेजना है।
बच्चे बाहर रहते हैं, अब बेटी आती है, वह सब करती है, बेटा आता वह करता है, बहू आती वह करती है। लेकिन रोज तो हमको निपटना है।
ढूँढते-ढूँढते आठ माह बीते इस बीच कितने ही मजदूर आकर दो चार दिवसीय कार्यक्रम निपटा दिए।
घर में तो रोज हमें देखना है आने-जाने वाले अलग तो सोचते हैं कि कौन सा काम पहले निपटा लें।
यदि लिखने सुबह बैठ गए तो? कुछ न कर पायेंगे बिन लिखे ओह रह न पायेंगे। फिर उपाय सूझता गया।
पोर्च से आम पेड़ तक बाउंड्री से आँगन तक फिर क्यारी से रसोई पूजा कमरे से बाथरूम सिर घूम गया लिखते हुए फिर भी चार बरामदे आठ कमरे बड़ा आँगन सब चकाचक रहने लगे।
क्योंकि यह जो उलझन है ये रहेगी ही यहां कोई स्थाई रूप से नहीं करते शहर की तरह। मजदूरी प्रतिदिन घर में कुछ घंटे का दो सौ रुपए है।
तो हम तो फुलटाइम जॉब कर लिए।
बर्तनों का ढेर कर रख दिया जूठा धोकर, धीरे-धीरे धोते हैं बैठकर इकठ्ठे।
जीवन भर न किया अब वहीं बात है न ‘जवानी नींद भर सोया बुढ़ापा देखकर रोया।’
झाड़ू किस्तों में पोछा भी किस्तों में केवल रसोई रोज।
अधिक लोग होने पर पत्तल दोना, नाश्ता आदि हम दोनों तो हैं ना! दूध, दही, पोहा, केला, फल दलिया, हलवा आदि।
अभी तक पपीता था, अब आम हैं खूब घर के मजे हैं।
भोजन पूरा दोनों समय नहीं। एक समय सब आइटम। शाम को पार्टी स्टाइल। है न समाधान?
गाय सेवा पतिदेव के हिस्से हैं। राउत दूध निकाल देता है। एक मजदूर भूसा दाना आदि का सहयोगी है।
कपड़ों के ढ़ेर कोई आए चादर ही चादर ठंड भर उफ्फ क्या बताएं पायदान से किचन क्लॉथ तक। हरि बोल।
अब क्या कहे उलझन कब सुलझेगी इससे निकलने के लिए सही मार्ग है जब अवसर मिले पढ़ो लिखो। थक तो जाते हैं, पर रात को ही समय मिलते ही लग जाते हैं, लगे रहो मुन्ना भाई जिंदगी है, धागे में उलझे याने तोड़-फोड़, काट-पीट की स्थिति होती है।
जीवन है उलझन से सुलझ गए तो याद आते हैं महापुरुषों के वाक्यांश कि आदमी काम की अधिकता से नहीं थकता, वरन उसे बोझ समझकर करने से थक जाता है।

-अमिता रवि दुबे

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