उलझन

रीना की जिन्दगी में उलझनें की सीमा ना थी एक खत्म होती दूसरी आमने आ जाती।
रीना तेरह घर में झाड़ू-पोछा कर अपना जीवन यापन करती।
रीना की बेटी के होते ही उसी माह पति को केंसर हो गया और चल बसे।
रीना की एक बेटी जो आठवीं की परीक्षा में प्रथम स्थान से पास हुई। रीना चाहती मेरी बेटियाँ को कभी ये काम ना करना पड़े। बेटी अफसर बने।
गांव में पुराना मकान जिसमें आधा कब्जा चाचा ससुर ने लिया आधा हड़पने के लिए कोट कचहरी तक उतर आये।
रीना की आर्थिक स्थिति भी कमजोर थी। केस नहीं लड़ना चाहती थी, गांव वाले ने समझा बात बन गयी।
बुढ़ी सास भी जो कुछ दिन गांव में, कुछ समय रीना के पास रहती छोटी खेती से आनाज आ जाता। सास पूजा की थाली लेकर उतर ही रही थी कि सीढ़ी से पैर फिसला और कमर की हड्डी क्रेक हो गयी। सरकारी हास्पिटल में दिखाया,डॉ. ने कहा- ना उम़ आपरेशन की है, ना ये कभी चल पायेगी सेवा करें।
रीना के आसूं डबडबा गये, जिन्दगी में मुश्किलें और उलझनों का साया मेरे ही सर पे क्यूँ मड़राता है।
हे प्रभु! कब तक मेरी परीक्षा लोगे?
सास का पूरा दैनिक कार्य समाप्त कर, काम पर निकलती।
रात दस बजे घर पहुचकर खाना दवा देकर सास के हाथ-पैर दबाती। सासु माँ, रीना और बेटी सिया को खूब प्यार और आशीर्वाद देती।
एक दिन सासु माँ की सासें थम गयी, रीना ने मुखाग्नि दी। माँ-बेटी फूट-फूट कर रोती रही, एक-दूसरे के आंसू को पोछती रही। अचानक पीछे से किसी अजनबी ने आवाज लगाई – कोई है?
रीना आसूं बहाती दरवाजे पर पहुची -हाथ में लिफाफा थमाया और अजनबी चला गया, बेटी सिया ने लिफाफा खोला- ‘माँ में कलेक्टर बन गयी’, कल से ज्वाइन करना है।
माँ ने सिया को गले से लगा लिया आज मेरी मेहनत, माँ की सेवा सफल हुई।
सासु माँ के आशीर्वाद से तुझे ये नौकरी मिली, जिन्दगी की उलझनें सहते-सहते रीना को
डर था, कहीं उलझनों का साया फिर से घेर लें।
सिया ने कहा- नहीं माँ मैं अपने पैरों पर खड़ी होकर आपको हर सुख दूगीं, जिसकी आप हकदार हो। उलझनें परेशानियों से भी एक नयी राह और सीख मिलती है।

-ऊषा नौगरहिया
कटनी

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