परम प्रिय जिंदगी,
सदा खिलखिलाती रहो।
हाय डियर! अब ये ना कह बैठना कि ये कैसा आशीर्वाद दे दिया? अरे सखी ये जो दुनिया है ना इसे रोते-बिसूरते लोग बिलकुल अच्छे नहीं लगते। जमाने में वैसे भी क्या कम गम हैं डियर। बस तुम खुश रहते हुए वही खुशमिजाजी की गमक से सारे जग को महकाती रहो। यही मेरी कामना है।
जब लड़कियां थोड़ी समझदार हो जाती हैं तब मां को बीमार बना कर तुमने मुझे दिया पहला झटका। पर कदम-कदम पर साथ देते, हिम्मत दिलाते और भावी जीवन के लिए मार्ग प्रशस्त करते पापा भी तुम्हीं ने देकर बनाया एक संतुलन। चार भाई-बहनों में सबसे बड़ी मैं पापा का बड़ा बेटा बनकर बन बैठी वकील।
सास-श्वसुर व 6 भाइयों के थोड़े से रूढ़िवादी संयुक्त परिवार में हुआ विवाह!
पर तुमने रखा ध्यान और मिला मुझे सुलझे विचारों वाला जीवनसाथी और जिंदगी की गाड़ी सरपट निकल पड़ी।
कुछ ऐसी परिस्थितियां भी तुमने प्रस्तुत की जो शायद मेरी परीक्षा की घड़ियां थीं। पर वे मुझे विपरीत लगने लगी थीं। बस उन्हीं में उठे एक कदम ने मुझे ला पटका लगभग दो-ढाई महीनों के लिए अस्पताल में। फिर तुम्हारी कद्र हुई डियर। सब कुछ झेलते और जूझते हुए मुझे लगे सामान्य होने में लगभग दो बरस।
शुक्रगुजार हूॅं तुम्हारी जो तुमने मुझे दिया दूसरा मौका। वर्ना भला कितनों को नसीब होता है दूसरा मौका? साथ ही आभारी हूं अपने सारे परिवार और शुभचिंतकों की जो हर पल मेरे साथ खड़े रहे।
बस फिर तो तुमने मुझे एक अलग ही इंसान बना दिया। पहले हॅंसती थी अब ठहाके लगाती हूॅं! पहले मुस्कुराती थी अब खिलखिलाती हूॅं। पहले चलती थी अब दौड़ लगाती हूॅं। पहले बस ऐंवई रहती थी अब सज-सॅंवर कर स्मार्ट बनने की कोशिश करती हूॅं। पहले सिर्फ परिजनों के लिए जीती थी अब खुद के लिए भी जीने लगी हूॅं।
कुछ गलत तो नहीं कर रही हूॅं ना जिंदगी? प्लीज़ मेरा मार्गदर्शन करना! जहां गलत हो एक इशारा जरूर करना। वैसे तुम इतना कुछ सिखा गई हो कि अब इस उमर में क्या तो सुधरूंगी! पर मेरे कारण किसी का बुरा, किसी को कोई कष्ट ना हो, इसका ध्यान रखना प्रिये।
अब बस करती हूॅं। मेरी-तुम्हारी बातें भला समाप्त हो सकती हैं? अपने नये अनुभव मुझे देते रहना।
सीखने की कोई उम्र नहीं होती है..
तुम्हारी ये बात मुझे हमेशा याद रहती है। तुम सिखाते रहना मैं सीखती रहूंगी। जब तक रखना फिट-फाट रखना। जीवन के सभी नरम-गरम पहलुओं को जो तुम्हारे प्रिय व अपने हैं उन सभी को मेरा सादर वंदे और यथायोग्य अभिवादन प्रेषित हो।
उत्तर तो तुम कभी देती नहीं हो। बस सीधे अपना जलवा ही दिखाती हो। इसलिए पत्रोत्तर को नहीं कहूंगी।
तुम्हारी अपनी
-सुषमा अग्रवाल
नागपुर (महाराष्ट्र)
