तुम्हारे मीठे मधुर,
शब्दों की बरसात।
मैं भीगी थी उस रात।
दोनों के अल्फाज।
एक दूजे की आवाज।
गूंजती रही दूर-दूर तक अंदर।
धीरे-धीरे खामोशी का समंदर।
बढ़ता गया।
अल्फाज चुप हो गए।
भावनाओं की लहरें,
प्रतिपल बढ़ती गई।
बिना बोले समझते रहे।।
एक दूजे को,..
-प्रसन्न चोपड़ा
