फेर के मुँह को मुस्कुराने में
दिल को माहिर है वो सताने में
लुत्फ़ पूछो है क्या मेरे दिल से
जान के दिल पे चोट खाने में
इश्क़ में इक मैं ही नहीं रुसवा
ज़िक्र उस का भी है फ़साने में
उस की आमद पे हैं बिछी आँखें
दिल है मसरूफ़ घर सजाने में
एक बस इश्क़ ही नहीं मुझ को
काम हैं और भी ज़माने में
– दिलीप मेवाड़ा
