एक बिखरता हुआ आदमी
खोज रहा
टूटी पंखुड़ियाँ
अपने जैसौं की तलाश में
लगा हुआ
कोशिश में दिनभर
साझा ध्वनियों के उच्चारण
परख रहा
रखकर कानों पर
कोई सूत्र कहीं मिल जाये
पिरो रहा
माला की लड़ियाँ
यह एकल व्यायाम नहीं है
खुद ही मुद्गर
रहो घुमाते
या रिश्तों के तरणताल में
तैर अकेले
रहो नहाते
सामूहिकता से चोटी पर
चढ़ पायेंगे
लेकर छड़ियाँ
हर युग के कुछ यक्ष-प्रश्न हैं
उत्तर देता रहा
समय भी
फिर भी हर अस्तित्वबोध में
छिपा रहा
कोई संशय भी
जीवन चलता रहे निरंतर
जोड़ें मिलकर
साझी कड़ियाँ
-जगदीश पंकज
