यहीं तो था
अज्ञात कूट संकेतों के
अप्रचलित उच्चारणों में गूँजता
तुम्हारी हँसी का मन्द्र अनुनाद
यहीं रखे थे
प्रागैतिहासिक अविष्कारों से
पूर्व के शीत और ताप
यहीं राग, विराग और हठ थे
यहीं थे त्वरा और शैथिल्य भी
जब पावस ऋतु के
आदिम रन्ध्रों की झीसियों से अविराम भीजती थी धरा
कंपकपाते गात की सिहरन यहीं तो रखी थी
अच्छे भले तटस्थ दिनों में
जब तब चली आती थी एक याद सुबकती हुई
याद थी हठीली,
मौसमी बुखार की तरह देह को मथती
उस याद में भी
तुम्हारे नाम की अचेत बुदबुदाहट यहीं तो थी
यहीं उत्सव थे, यहीं शोक
यहीं उन्माद था, यहीं संकोच
यहीं क्षण क्षण कटता था मन, दुःख के सरौते से
यहीं रेतघडी सा था जीवन
प्रतिपल छीजता और रीतता हुआ
यहीं प्रेमिल संवाद थे,
यहीं अभेद्य अकेलापन
ईर्ष्याएँ यहीं थीं अदम्य, भीतर तक पैठी हुईं
यहीं हास्य था, यहीं रुदन
यहीं था अटूट वैराग्य, यहीं अकुंठ विलास
इसी विखंडित क्षितिज पर
पराजय का टूटा हारा सूर्यास्त था
यहीं झिलमिल आशाओं का झीना मद्धम आलोक भी
देह की इस बंजर भूमि में
खनिजों धातुओं और जीवाश्मों के अतिरिक्त था
आकंठ प्रेम से भरा हुआ मन भी
पुरातत्व वालों की काहिली देखो
उन्हें यहां न गाढ़े चुम्बन मिले
न अंतरंग स्पर्श और न ही आकुल आलिंगन ही
तुम तो जानते हो
आत्मा के इस जीर्ण खोखल में ही तो रखी थी
बिंब दोष से खंडित मेरी कच्ची पक्की कविताएँ !
यहीं थी न
तुम्हें खोजती मेरी आर्त विह्वल पुकार!
भूगर्भ शास्त्री कब के लौट गए
जबकि यहीं भग्न जीवन था
यहीं अटल मृत्यु
यहीं तो…
-सपना भट्ट
