कभी-कभी यूँ लगता है
जैसे ज़िंदगी यूँ ही बेमकसद सी गुज़र रही है,
सुबहें आती हैं
अपने तय समय पर,
खिड़कियों पर धूप भी उतरती है,
पर भीतर कहीं
एक कोना वैसा ही अँधेरा रह जाता है।
दिन भर के शोर में
कितनी ही आवाज़ें सुनाई देती हैं,
पर अपनी ही आवाज़
सबसे धीमी पड़ जाती है।
रास्ते चलते रहते हैं,
कदम बढ़ते रहते हैं,
लोग मिलते हैं, बिछड़ते हैं,
और समय
अपनी आदत के मुताबिक
बिना रुके आगे निकल जाता है।
तब मन पूछता है—
क्या यही सफ़र है ?
क्या इसी का नाम जीवन है?
लेकिन फिर किसी अनजान क्षण में,
एक मुस्कान,एक पुरानी याद,
या किसी अपने का छोटा सा हीं स्पर्श
याद दिला जाता है
कि ज़िंदगी हमेशा
बड़े मकसदों में नहीं बसती,
कभी-कभी वह छिपी होती है
छोटी-छोटी बातों में—
एक उम्मीद में,
एक प्रतीक्षा में,
एक अधूरे सपने में,
जो अब भी आँखों में जगह बनाए हुए है।
और तब लगता है,
शायद यह सफ़र बेमकसद नहीं,
बस इसका अर्थ
हर मोड़ पर नया जन्म लेता है।
-रश्मि अभ्या
