कलमों की तीखी नोकों से,बिंधते नहीं मोती।
शब्दों की तुकबंदियाँ कविता नहीं होती!
ग़र कोई ये दावा करें,रखता है हुनर पास!
वो शारदा का सुत नहीं,करता है बस बकवास।
उसकी कृपा के बिन कहीं पत्ता नहीं हिले,
कैसे करेगी लेखनी साहित्य मे उजास?
शायर कवि बनने की बातें, है महज थोथी।
यूं तो जगत में, ज्ञान का न कोई छोर है।
जो लिखता हूँ वो कहता मुझमें कोई और है।
उसने कलम थमा के मुझसे, जो कहा लिखा!
भावों के चयन में भला, क्या मेरा जोर है?
उसकी कृपा ही, जहन में बीजों को है बोती।
जब डूबता है मन कोई चिंतन के रंग में।
मन बादलों सा उड़ता है, तन की तरंग में।
जब चेतना की आँधी में, फॅंस जाती है लहर,
तब बिजलियाँ सी कौंधती है, अंग अंग में।
तब भावनाऐं पंक्तियाँ बन गीतों को ढ़ोहती।
कविता सृजन है, मनन के सागर में तैरना।
कुछ अनछुए और अनकहे, चित्रण उकेरना।
शब्दों का भान, नाद के संग, राग से मिले।
तब ही सफल हो पाता है, माला का फेरना।
ये राज जिसने जाना, उसके मन जले ज्योति।
-सत्येन्द्र मण्डेला
