तू तो मेरे अंदर समाहित थी कविता।
मुझे तो पता न था ,पता ही न था।
हिम के शिखर को ,रवि रश्मी बन चूम
रही थी।
निर्झरी बन ,मोतियाँ बिखेरती भू पर उतरी थी।
पेड़ों के झुरमुट से चुप झाँक रही थी।
गौरया बन के आँगन में नाच रही थी।
हवाओं की सनसनाहट में छुपी थी।
मधुकर की गुनगुनाहट में बसी थी।
तू मेरे अंदर मचल रही थी, कविता।
अधरों से जाना उपवन में फूल खिला।
तेरे नयनों से जाना कलियों पर भौंरा मचला।
कहीं बहती नदिया की धार तू।
कभी केवट के नैया की पतवार तू।
निर्मल नीर मे शशी की प्रतिबिंब बनी।
भानू के जल पग धरते ,तू इंद्रधुष बनी ।
तू मेरे अंदर नीहित थी कविता ।
तेरा श्रंगार हुआ ,पहन अंलकार तू इतराई।
शब्दों में रस भर कर ,हुई तेरी गोद भराई।
कभी सुहागिनों का सिन्दूर बनी ,
कभी वीरों के तलवार की धार बनी।
कहीं हर्ष कहीं विषाद का रुप धरा तूने।
कितना तेरा गुण गान करुँ ओ कविता।
कागज कलम दवात मिले ,
अंबर के अगिनित तारों सा तू रुप धरे।
तू ही जीवन ,तू ही मन, तू ही दर्पण।
हे सरस्वती! के वीणा की झंकार।
तुझको बरंबार प्रणाम -बारंबार प्रणाम
-कमला अग्रवाल
गाजियाबाद (उ.प्र.)
