कहाँ गई अब एकता, कहाँ गया भाईचारा
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
कहाँ गई अब एकता, कहाँ गया भाईचारा।
हिन्दू, मुस्लिम, सिख और ईसाई,
प्रेम से रहते थे सब भाई।
एक-दूजे के सुख-दुख बाँटें,
मिलकर जीवन-पथ को काटें,
अनेकता में एकता का भारत था नारा।
कहाँ गई अब एकता, कहाँ गया भाईचारा।
जातिवाद और प्रांतवाद में
बँटता जाता देश हमारा,
अपनी-अपनी सबको चिन्ता,
बढ़ता मन में द्वेष का धारा।
दुख के आँसू से भीगा है
भारत माँ का आँचल सारा।
कहाँ गई अब एकता, कहाँ गया भाईचारा।
पास-पड़ोस और समाज में
हिलमिल कर सब रहते थे,
तीज-त्योहारों के अवसर पर
मिल-जुलकर उत्सव करते थे।
कोई भी विपदा आ जाती,
बनते सब इक-दूजे का सहारा।
कहाँ गई अब एकता, कहाँ गया भाईचारा।
आओ फिर से प्रेम जगाएँ,
मन से सारे भेद मिटाएँ।
जाति, धर्म की दीवारों को
मिलकर हम सब दूर हटाएँ।
फिर गूँजे हर गली-नगर में
एकता का पावन जयकारा।
कहाँ गई अब एकता, कहाँ गया भाईचारा।
-राकेश नमित
