वो बातें जो मुक़द्दर का नाम ले कह दी हैं मैंने,
आज शब्दों में तराश, कागज़ पे रख दी हैं मैंने।
आँधियों में छप्पर सा वजूद उड़ गया था मेरा,
ठहरकर अब बातें अँखियों से कह दी हैं मैंने।
क्यों अधूरे सपने में खुल जाती थीं आँखें मेरी,
अब बिखेरो चाँदनी, बात चाँद से कह दी है मैंने।
उठ गए लाख सवाल, ज़रा सा मुस्कुरा दिया मैंने,
वासी हूँ मैं काँटों की, ये दास्तां भी कह दी है मैंने।
‘दीप्ति’ बैठी बन अहिल्या, देखो बीच नगर में,
आएँगे राम इस नगर में, ये बात सबसे कह दी है मैंने।
-दीप्ती जैन
