ख्वाब मेरे नाजुक से
सुबह की धूप से
कभी ढलती शाम से
कभी कभी तपती रेत से
हर बार ना जाने क्यों
किरिच किरिच हो जाते
मैं टुकड़ा टुकड़ा ख्वाब का
बटोर कर जोड़ती
मेरे अंतर्मन में गढ़ जाते
कभी फास से चुभ जाते
इन बिखरे टूटे ख्वाबों
को एक दिन जरुर
संवारुगी सजाऊंगी
अपनी मंजिल पर पहुंचाऊंगी
फलक तक ऊंचा उठऊंगी
-अर्विना गहलोत
ग्रेटर नोएडा
