माना मेरी तुझसे यारी है,
ये इश्क अजब बीमारी है।
देखे हैं ख्वाब जो मैंने-तूने,
बीच में दुनियादारी है।
लब सिले हैं, मौन मुद्रामय,
कह दे क्या लाचारी है।
समय मिले संवाद कर लेना,
मन अधीर, तन भारी है।
अनुमोदनाएँ पुकार रही हैं,
याद वचन हर बारी है।
तेरे मनभावन सपनों पर,
काजल की पहरेदारी है।
स्वप्न करूँ मैं पूरे कैसे,
मेरी यही बेकरारी है।
-प्रदीप कुमार अरोरा
झाबुआ (मध्यप्रदेश)
