शहर का आनंद दिन में पति है, पिता है, ऑफिस का अफसर है। मीटिंग, लैपटॉप, बच्चों की ऑनलाइन क्लास। सब कहते हैं बड़ा सेट है।
रात 11 बजे घर में सन्नाटा। बच्चे सो गए। पत्नी की तस्वीर दीवार के कोने में टंगी पड़ी है, आठ महीने से वो करवट बदलकर डाँट नहीं रही।
आनंद फोन निकालता है। गैलरी खोलता है। माँ की 72 साल की फोटो, सफेद बाल, आँखों में मोतिया। स्टेटस लगाया है उसने – “बेटा कब आएगा?”
10 साल हो गए गाँव छोड़े। अब खत नहीं आते माँ के, WhatsApp पर मिस्ड कॉल आते हैं। सोच ही रहा था तभी रात 11:03 माँ का कॉल, उठाऊँ की नहीं, साइलेंट कर देता हूँ। दिल में सोचता है बात करूँगा तो रो पड़ेगी। मैं रोऊँगा तो वो टूट जाएगी।
सुबह उठकर माँ का वॉइस नोट सुनता है। काँपती आवाज़- “बेटा आनंद, 72 की हो गई हूँ। शुगर बढ़ गई है। पैर में सूजन है। कल चक्कर आ गया था। पड़ोसन ने सहारा दिया। तू आकर एक बार मिल तो जा, सुबह कॉल करना तेरी आवाज सुने महीना हो गया।”
बच्चे कहते हैं – “पापा, पुराने हो गए हो । मम्मी की DP लगाओ ना।” उधर माँ का स्टेटस कहता है – “बेटा भूल गया क्या?”
रात को फिर माँ की DP खोली। एक बूंद आँसू की गिरी, स्क्रीन धुँधली हो गई।
आनंद फुसफुसाया “माँ, तेरी DP पुरानी हो जाए… पर तेरा कर्ज नहीं।
दुनिया के लिए वो आनंद है ऑनलाइन, अप-टू-डेट, डिजिटल।
माँ के फोन में वो आज भी केवल है “मेरा केवल बेटा”
यही उलझन उसे जीने नहीं देती दूसरी तरफ यही उलझन जीने का सहारा भी बन जाती है।
-आनंद पाण्डेय “केवल”

1 कमेंट
बहुत सुंदर 👌