दाढ़ी रखना सरल है, पर निभाना… तपस्या है।
सुबह दर्पण के सामने खड़ा मनुष्य योद्धा है।
एक हाथ में कंघी, दूसरे में धैर्य।
हर बाल एक प्रश्न है-
“इधर मुड़ूँ या उधर?”
बाल बढ़ते हैं तो लोग पूछते हैं-
“कब तक जटाधारी रहोगे?”
कटवा लो तो वही लोग पूछते हैं-
“अरे, पहचान में नहीं आ रहे, इतने बदल गए?”
दाढ़ी वाला हर मोड़ पर प्रमाण-पत्र देता फिरता है-
“मैं वही हूँ, बस मुंडित नहीं हूँ।”
बारिश आई तो दाढ़ी जलकुंड बन गई।
भोजन किया तो दाल का प्रसाद उसमें लग गया।
चाय पी तो दाढ़ी ने पहले घूँट ले लिया।
फिर भी हम मुस्कुराते हैं।
क्योंकि दाढ़ी केवल बाल नहीं,
धैर्य का विज्ञापन है।
जिसके चेहरे पर जंगल है,
उसी के मन में उपवन है।
जय हो सभी दाढ़ी बाबाओं की!
-आनंद पाण्डेय “केवल”
