कोई नहीं है अपना !
शाम ढली तो पाया खुद को निपट अकेला,
जगा रात भर,बदली करवट,हुई सुबह की बेला।
छूट गए सब लक्ष्य अधूरे, बीते कितने मौसम,
टूटी आशा,बिखरे सपने, मौन हुए सब आलम।
बहुत कठिन है इस जीवन को एक जोगी सा रखना—
कोई नहीं है अपना ।।
थककर लौटे पाँव मगर, मिलता नहीं ठिकाना,
भीड़ भरे इस जग ने हर पल,मुझको किया बेगाना।
चेहरे पर मुस्कान सजाकर, दर्द बहुत दफनाया,
जिसने पूछा हाल, उसी को हँसकर हाल बताया।
उखड़ रहे हैं पाँव यहाँ पर,कितना कठिन है रूकना —
कोई नहीं है अपना ।।
—पंकज ‘जुगनू’
