देह के गीत गाते रहे उम्र भर,
मन सहज सब व्यथा पीर
सहता रहा।
बालपन सुख, जवानी रहीं उलझने,
अंत में तन व्यथा सह रहा हार की।
क्या कहूँ आदि की मैं प्रभाती कहो,
क्या कहानी लिखूँ जीव के सार की।
पीर तन की सभी,बोझ जीवन सभी,
मन बिचारा उठाकर
घिसटता रहा।
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जग जकड़ता रहा चक्र से जाल में,
कामना में बँधा तन उलझता रहा।
देह को सत्य माना सँवरते रहे,
अनमना संग में मन मुकरता रहा।
देह की ही रही, याद पहचान बस,
मन कहीं मौन गुपचुप
बिसरता रहा।
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मन भले बन्धनों में बँधा हो नहीं,
हर समय साथ पिंजर के चलता रहा।
तन समय-सलवटों में सिमटता रहा,
मन किनारे किनारे ठिठकता रहा।
तन जला है युगों से,धुआँ बन मिटा,
मन विवश हो सदा ही
सिसकता रहा।
-सीमाहरि शर्मा ( गीत अँजुरी से)
