क्या मई

शीत बरखा की तरह ही, बीत यह ऋतु भी गई।
माह लगते एक-से ही, क्या दिसम्बर क्या मई।।

मैं नहीं कहता कभी यह, कर्म नित से तुम बचो,
शेष स्मृतियों में रहे निज, कुछ कभी ऐसा रचो,
मन हरे जो भोर देखो, शाम देखो चम्पई।
माह लगते एक-से ही, क्या दिसम्बर क्या मई।।

तुम कभी निर्लक्ष्य चलना, मार्ग को साथी बना,
फिर कभी बस मौन रहकर, देखना तुम तम घना,
चन्द्र-ज्योत्स्ना के बिना भी, रात होती सुरमई।
माह लगते एक-से ही, क्या दिसम्बर क्या मई।।

तर्क ही सब-कुछ नहीं है, तत्त्व भी समझा करो,
भाव-मदिरापान कर कर, तुम कभी बहका करो,
मार्ग तजकर सब पुराने, तुम सृजो राहें नई।
माह लगते एक-से ही, क्या दिसम्बर क्या मई।।

-डॉ. पवन कुमार पाण्डे
असोसिएट प्रोफेसर
निजामाबाद (तेलंगाना)

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