दूर नगर के कोलाहल से
जब तन मन क्लांत हुआ
तब सागर की लहरें
चैन दिलों को दे जाती
क्या सचमुच
ऐसा भी होता है !
देख बस्तियां इंसानों की
ऊंचे ऊंचे ख्वाबों से
थककर रुक जाता जब मन
तब लहर लहर समंदर
दे जाता है चैन
क्या सचमुच
ऐसा भी होता है !
सपने सब टूट गए हों
और अपने भी रूठ गए
सुरमयी बादलों के मंजर में
कोई हाथ थमा कर राह दिखाए
क्या सचमुच
ऐसा भी होता है !
बिखरा सा सन्नाटा हो जाए
करे हवाएं सांए सांए
निर्जन मन के कोने में
क्या कोई ऐसे में
स्वयं को ही पा जाता
क्या सचमुच
ऐसा भी होता है !
-मीनाक्षी भटनागर
गुरुग्राम
