याद करो वो समय जब
मेरे बोलने से, चहकने से, तुम परेशान हो जाते थे
कितना चिढ़ जाते थे
हर समय बोलती रहती हो,
कभी चुप भी रहा करो,..
समयांतराल में मैंने ख़ामोश रहना सीख लिया,
सीख क्या लिया, वक्त और हालात ने सिखा दिया,
अब तुम बार बार कहते हो इतनी चुप क्यों हो?
कुछ बोलो!
क्या बोलूं?
अब मैं शब्द ढूंढते ही रह जाती हूं
शिकायतें मन की उलझनें, उलाहने,
सपनों की बिखरी किरचे
सबका भारी बोझ जो
दिलो दिमाग पर रखा है
उनको परे कर कैसे अब अपनी ख्वाहिशों को शब्द दूं?
बहती अलग-अलग धाराएं जाने कब मिल कर एक विशाल खाई बना दीं,
समझ ही ना आया?
अब तुम बोलो!
मुझे सुनना पसंद है!
मेरा मौन ही तो है जो विपरीत हालातों में दुनिया के समक्ष मुझे अडिग रखता है!
ना अब नहीं,
अब नहीं बहने देना है अपनी ऊर्जा शब्दों के रूप में,
हम संग हैं! पर अलग-अलग कवच में कैद,
चलो साथ साथ चलें उस आखिरी छोर तक,
बिना बोले,
ख़ामोश मेरा हाथ थाम कर!!!
-नमिता दुबे मिशा
