“स्वानुभूती”
आज मेरी खुद से, मुलाकात हो गई,
बातों-बातों में खुद की, बात हो गई।
क्या किया अब तक, क्या पाया मैंने,
हाय! कैसी यह मेरी, हयात हो गई।
अभी तो हुई थी, सुनहरी-सी सुबह,
ऐसे कैसे ज़िन्दगी की, रात हो गई।
किस लिये भेजा था, ज़मीं पर मुझे,
ये पूछते ही मौन, कायनात हो गई।
लफ़्ज़ लबों से, निकल ही नहीं पाए,
खुद से आज खुद की, मात हो गई।
है प्रभु! ये कैसा, ख्वाब था ‘समन्दर’,
ऐसा लगा जैसे मेरी, वफ़ात हो गई।
-गोपेश दशोरा
उदयपुर (राजस्थान)
