खुशियों का एटीएम

अपने बेटे की शादी कर चुके अवधेश लाल को पोता या पोती के आने का इंतजार सता रहा था।
बेटे की शादी के बारह साल गुजर चुके थे और अबतक बच्चों की किलकारी से अवधेश लाल जी का आंगन सुना था।
अवधेश लाल जी के मुखड़े में उदासी छाई रहती थी।
बहुत सारे मंदिरों में मन्नत मांग चुपचाप ईश्वर की लीला को देख रहे थे।
अवधेश लाल की पत्नी निर्मला भी अपने अराध्य देवों से पोता पोती कुछ भी हो, एक खुशियाँ मांग रही थी।
अपने माँ बाप की कामना पूरी न कर पाने से अवधेश लाल का पुत्र और पुत्र बधू भी परेशान थे।
समय गुजरता गया।
अवधेश लाल का पुत्र विक्रम अपने ऑफिस में यूँ उदास हो बैठा था।
विक्रम की परेशानी से भिन्न विक्रम का मित्र रुप लाल ने विक्रम को बच्चे के लिए आई वी एफ का सहारा लेने को कहा।
आई वी एफ की विस्तृत जानकारी देकर रुप लाल ने विक्रम को जोर देकर कहा।
अब इंतजार मत करो।
किसी आई वी एफ सेंटर से मदद लो।
ईश्वर की कृपा हुई तो बच्चों की किलकारी घर में गूंजेगी।
विक्रम को रुप लाल की सलाह पसंद आई और फिर उसने अपने माँ बाप से बिना पूछे आई वी एफ का सहारा ले लिया।
तीन महीने तक तो विक्रम और बहू ने इस बात को छुपाए रख्खा।
बहू के गर्भधारण से निंस्चिंत होने के बाद विक्रम ने अपनी योजना को अपने माँ बाप को बताया।
अवधेश लाल और निर्मला की खुशी का तो ठिकाना नहीं रहा।
समय नजदीक आते ही अवधेश लाल के घर जुड़वे बच्चों का जन्म हुआ।
पोता-पोती दोनों एक साथ आकर अवधेश लाल की खुशियाँ दुगनी कर बैठे।
बच्चों का जन्म लेना मानो अवधेश लाल के हाथों खुशियों का एटीएम आ गया।

-अजय पाण्डेय ‘बेबस’

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