खुशियों का एटीएम

आर्यन बारह वर्ष का एक चंचल बालक था। उसके कमरे में खिलौनों की भरमार थी। नई वीडियो गेम, रिमोट कार, टैबलेट—जो भी उसे पसंद आता, वह माँ-पापा से माँग लेता।
जब भी वह उदास होता, उसकी एक ही फरमाइश होती— “मुझे नया खिलौना दिला दो, तब मैं खुश हो जाऊँगा।”
माँ-पापा उसकी हर इच्छा पूरी करने का प्रयास करते, लेकिन आश्चर्य की बात थी कि आर्यन की खुशी कुछ ही दिनों में गायब हो जाती। नया खिलौना आते ही वह कुछ समय खुश रहता, फिर किसी और चीज़ की माँग शुरू हो जाती।
एक दिन स्कूल में उसकी कक्षा के शिक्षक ने बच्चों से पूछा, “अगर तुम्हें दुनिया की सबसे बड़ी खुशी मिल जाए, तो तुम क्या करोगे?”
बच्चों ने अलग-अलग उत्तर दिए। किसी ने कहा वह घूमने जाएगा, किसी ने कहा ढेर सारी चॉकलेट खरीदेगा।
आर्यन बोला, “मैं इतने पैसे लूँगा कि रोज़ नए खिलौने खरीद सकूँ।”
शिक्षक मुस्कुरा दिए।
अगले दिन वे कक्षा में एक छोटा-सा पौधा लेकर आए।
उन्होंने कहा, “आज से यह पौधा हमारी कक्षा की जिम्मेदारी है। इसे प्रेम, देखभाल और समय चाहिए।”
बच्चों ने बारी-बारी से पौधे को पानी देना शुरू किया। आर्यन भी उसमें रुचि लेने लगा।
कुछ दिनों बाद शिक्षक ने बच्चों को एक और कार्य दिया। हर बच्चे को प्रतिदिन एक अच्छा काम करना था और शाम को उसे अपनी डायरी में लिखना था।
आर्यन ने पहले दिन अपने मित्र की कॉपी ढूँढने में मदद की।
दूसरे दिन उसने अपनी छोटी बहन को कहानी सुनाई।
तीसरे दिन उसने अपनी दादी के साथ बैठकर उनकी पुरानी बातें सुनीं।
धीरे-धीरे उसे महसूस होने लगा कि इन कामों के बाद उसके मन में जो खुशी आती है, वह किसी नए खिलौने से मिलने वाली खुशी से कहीं अधिक देर तक रहती है।
एक दिन उसने शिक्षक से पूछा, “सर, ऐसा क्यों होता है?”
शिक्षक ने मुस्कुराकर कहा,
“क्योंकि खुशी कोई वस्तु नहीं है जिसे बाजार से खरीदा जा सके। वह तुम्हारे भीतर रहती है—तुम्हारे आत्मविश्वास में, तुम्हारी मित्रता में, तुम्हारी कल्पनाशक्ति में और तुम्हारे अच्छे कर्मों में।”
उस दिन आर्यन देर तक सोचता रहा।
रात को उसने अपनी डायरी खोली और लिखा—
“पहले मैं खुशी खरीदना चाहता था,
अब मैं उसे बाँटना सीख गया हूँ।
मेरा मन ही खुशियों का सबसे बड़ा एटीएम है।”
डायरी बंद करते समय उसके चेहरे पर एक संतोषभरी मुस्कान थी। शायद पहली बार उसने ऐसी खुशी पाई थी जिसे न कोई चुरा सकता था, न जो कभी पुरानी पड़ने वाली थी।
शिक्षा:
सच्ची खुशी वस्तुओं में नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, प्रेम, मित्रता, कल्पनाशक्ति और अच्छे कर्मों में छिपी होती है।

-डॉ संगीता बिंदल

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