खुशियों का ए टी एम

  सुधा एक बात पूछूँ तुमसे? 

हूँ ! पूछो इसमे इतना झिझकने की क्या बात है।
तुम इतने मुश्किल हालात में भी इतनी मुतमईन और खुश कैसे रह लेती हो? वैसे सलाम है तुम्हारी हिम्मत को।
वर्धा सुधा की जिंदगी के हर उतार-चढ़ाव से वाकिफ थी, सब कुछ उसके सामने ही तो हुआ था, पति को कारोबार में नुकसान, ब्रेनहेमरेज और बिस्तर पर लग जाना, कैसे हस्पताल, घर और कंम्पूटर सेंटर के चक्कर उफ्फ वो सब कम नहीं था तिस पर सास ससुर का एक और धमाका सोमेश को सही देख भाल न होने की बात कह अपने साथ ले जाना और घर खाली करवा लेना, फिर भी सुधा को उसने रोते बिसूरते नहीं देखा उसने हमेशा एक सौम्य मुस्कान सजी पाई उसके चेहरे पर कभी कोई शिकायत नहीं न ईश्वर से न तकदीर से ।
कैसे उसने विपरीत परिस्थितियों में अपने कंम्पूटर इंस्टीट्यूट का एक हिस्सा बेच कर कर्जा चुकाया सारे स्टाफ को हटाकर अकेले पूरा इंस्टिट्यूट संम्हाला बेटे को पढ़ाया, अकेले दम पर उसने सब कितना कठिन था अर्श से फर्श पर आ गई थी सुधा, सोच कर आँखे नम हो गई ।
कहाँ खो गईं?
कहीं नहीं। तुम सुनाओ अपनी इस खुशमिजाजी का राज।
ये कोई इतना मुश्किल काम नहीं है। तुम्हें पता है न हम बैंक में पैसे जमा करते हैं और जरूरत पड़ने पर एटीएम कार्ड का इस्तेमाल कर एटीएम से निकाल लेते हैं। कुदरत का नीयम भी यही है जो दोगे वो पाओगे, ईश्वर की हिसाब किताब की बैलेंस शीट कर्मो पर आधारित होती है मैंने अपने लिए खुशियों का खजाना तैयार किया खुशियाँ बाँट कर मैंने आँसूओ की जगह मुस्कान को चुना हर हाल में खुशी महसूस की और अपने जैसे लोगो को हिम्मत दी हालात से लड़कर आगे बढ़ने का हौसला दिया जब वे मुस्कुराते मैं अपनी सारी तकलीफ भूल जाती मैंने अपने लिए खुशियों का एटीएम बनाया और आज मैं जब चाहे उससे अपनी खुशियाँ निकाल सकती हूँ , मैं समझ रही हूँ तुम क्या जानना चाह रही हो, वर्धा खुशियाँ हमेशा पैसो से नही आती मेरा सबकुछ छीन कर भी वो खुश नहीं हैं और अपना सब गंवा कर भी मैं हारी नहीं।

-स्मृति गुप्ता
जबलपुर

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