गर्त में समाता समाज

“कहाँ गए परम्परा/रीति-रिवाज”

कुछ पुरानी हो गई परम्पराएं
जिन्हें आधुनिक युग
नहीं मानता…

अपने मनानुसार चलना है
कुछ नई रीतियाँ चल
निकलीं हैं,..

विवाह में बदलाव आया
दो लोगों के मिलन
नये जीवन में प्रवेश
की सबसे जरूरी
परंपरा।

पहले कई नेंगाचार होते थे
समयाभाव और
व्यस्तताओं ने धीरे-धीरे
उन्हें निगल लिया..

अटूट बंधनों में बांधने का
प्रतीक होते थे।
कुछ खत्म हो गये
कुछ कम कर दिए…

बहुत जरूरी कुछ
छोड़ रखे हैं
निभाने को,

सात फेरे, सात वचन फिर
मंगलसूत्र और मांग भराई
बड़ों का आशीर्वाद
वधू प्रवेश कुछ जरूरी
मान्यताएं
वह भी जल्द बाजी और
मजबूरी में निभाई।

कई तो उनको भी न मानें
कोर्ट ने जिनकी शादी
कराई।

दो गवाह एक जज और
बन गए पति-पत्नी
न ईश्वर साक्षी, न अग्नि साक्षी
पंडित और न मंत्रोच्चार,..

बस वैधानिक औपचारिकता
बंधन बंध गए दो यार
जब किसी ने देखा नहीं
तो जब जी चाहे
तोड़ दो बंधन।

अब एक और नई
रीति का शुभ आगमन
हो गया
लिव इन में रहने की
पति-पत्नी सी व्यवहारिकता
न चिंता किसी के सुनने कहने का,

जब तक जी चाहा निभा लिया,
भर गया मन तो तोड़ दिया,
लौट के बुद्धू जब घर आए-
समाज परिवार ने भी छोड़ दिया।

क्या देश गर्त में नहीं गिर रहा?
इन पश्चिमी रीतियों के आगमन से बचो,
बचाओ परिवार
समाज और देश को
स्वच्छंदता के इस प्रलोभन से,

चेतो, जानो
कुछ रिश्ते बंधन में ही
सुकून पहुंचाते हैं,
खुली स्वच्छंदता तो
हवाओं में भी नहीं है
लेकिन इस नई परंपरा
का आधार ही
स्वच्छंदता है
जो सीधे गर्त में ले जाती है।

इससे बचाव संभव है
इसका उपचार नहीं।

-किरण मोर
कटनी म. प्र.

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