मिसरों में ये जो लफ़्ज़ों के अंदर की बात है
आम आदमी की सोच से ऊपर की बात है
इक घर में रह के भी नहीं आपस में राब्ता
ये एक घर की ही नहीं , घर-घर की बात है
उसने कहा था जल्द मुलाक़ात होगी फिर
ये पिछले साल एक नवंबर की बात है
मिलना तो दूर उसकी ख़बर तक नहीं कोई
ये तो हमारे ज़ब्त से बाहर की बात है
अफ़सोस जो किसी के लिए त्रासदी है इक
वो दूसरे के वास्ते अवसर की बात है
कोई ग़मों से पस्त तो कोई ख़ुशी में मस्त
ये सबके अपने-अपने मुक़द्दर की बात है
टल जाएगी हर एक बला सर से झट तेरे
“मधुमन “ बस उसकी एक निगह भर की बात है
-मधु मधुमन
