जो न हो काली घटा तो,
पानी कभी न बरसे |
तब नादान मानव तू समझ ले,
अन्न एक न उपजे |
जो न हो नारी धरा पर,
वंश बेल न पनपे |
खुशियाँ क्या फिर इस धरा पर,
पक्षी तक न चहके |
बूँद – बूँद से जुड़कर मानव,
घटा काली हो जाती |
अपने काले रूप बरसकर ,
धन्य -धन्य हो जाती |
नारी भी कर्तव्य बोध से ,
कर्कश होती जाती |
पर.. अपने कर्त्तव्य बोध से,
पीछे कभी न हठती |
उजली बदली नहीं बरसती,
केवल धोखा देती |
शून्य में आँखे होती मानव,
हरियाली न होती |
ऐसे ही जो नारी होती ,
दुनिया कभी न चलती |
खुशहाली तब दूर खड़ी रह,
द्वारे कभी न आती |
नारी और घटा की कीमत,
इंसा तू समझ ले!
दोनो से ही सारी प्रकृति,
किस्मत वश में कर ले |
वरना मानव पछताएगा ,
जो रोएगी नारी |
नीर भरी बदली तब देगी ,
विपदा बड़ी ही भारी |
कहीं बाढ़ अकाल पड़ेगा ,
जो रोएगी नारी |
अश्रुपूरित नारी न हो ,
सोच आज हो भारी |
मानव ! तू मानव ही बन जा ,
मत बन तू व्यभिचारी |
“नारी – बदली ” एक है मानव ,
इन्हीं से दुनियादारी |
-सीता गुप्ता (दुर्ग छ. ग.)
