चाहती हूँ !…

ख्वाब में आओ सनम अब, नींद पाना चाहती हूँ !
मै मिलन की हर घडी, तुम सँग बिताना चाहती हूँ!

शब्द में लिखती तुम्ही को, गीत या कविता कोई हो,
बांधकर तुमको सुरों में, …गुनगुनाना चाहती हूँ !

साथ चाहे जिंदगी में ,कुछ पलों का ही रहा हो ,
लाख तुम रूठे हुए हो……मैं मनाना चाहती हूँ !

मैं धरा तुम आसमां हो , आस कोई भी नही पर,
जो कभी क्षण भर मिले वो, साथ पाना चाहती हूँ!

जिंदगी है इक समंदर , मैं नदी की एक धारा ,
साथ लहरों के मैं मिलकर, खिलखिलाना चाहती हूँ!

-मोहिनी गुप्ता

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