सुबह से ही शैली का मन बहुत बैचेन था।आज मतदान का दिन था।शेखर तो सुबह से ही घर से निकल गये, शैली खिड़की के पास आकर खड़ी हो गई।घर के सामने के स्कूल को भी मतदान केंद्र बनाया गया था। पुलिस की चाक-चौबंद व्यवस्था।चुनावी शोर भी अब थम चुका था; फिर वह पुरानी यादों में खो गई। पिछला चुनाव उसकी जिंदगी में एक भूचाल बनकर आया था।
शैली के पति शेखर, एक पार्टी के विशेष सक्रिय कार्यकर्त्ता, पार्टी के प्रत्येक कार्य में उनकी अहम् भूमिका रहती थी।
चुनाव के समय दिन-दिन भर बाहर और रात में भी देर से घर आना।
आखिर चुनाव का दिन भी आया। और उस दिन किसी छोटी सी बात पर दो गुटों के बीच वादविवाद हो गया। जिसने एक विशाल रूप ले लिया। हथियारों का प्रयोग हुआ, और वह एक खूनी चुनाव बन गया।
शेखर भी गंभीर रूप से घायल हुए। शहर में एक सप्ताह का कर्फ्यू लगा दिया गया।
शेखर की हालत भी ख़राब थी। उसके इलाज के लिये शुरू में तो पार्टी ने उसकी मदद की, किन्तु बाद में सबने अपने-अपने हाथ खींचना शुरू कर दिया। काम-धंधा सो अलग बंद हो गया। और बाद में उसके इलाज के लिये उसको अपने घर का आधा हिस्सा भी बेचना पड़ा। शैली सोचती ये कैसा लोकतंत्र??
कैसी आजादी??
मन में उठती एक अजीब सी उलझन; उमड़ते घुमड़ते ढेर सारे सवाल, जहाँ इंसान ने इंसानियत को ताक पर ही रख दिया।
चुनाव, जिसे लोकतंत्र का महापर्व माना जाता है, उसका तो पूरा अर्थ, पूरा स्वरुप ही बिगाड़ दिया आज इंसान ने। पद की लालसा में एक इंसान के मन में एक इंसान के प्रति इतनी ईर्ष्या, द्वेष,लालच;
तभी पुलिस की गाड़ी के सायरन से उसकी तंद्रा भंग हुई। आकर रसोईघर के काम में लग गई और मन ही मन कह रही थी,
भगवान, बस आज चुनाव शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो जाये। शेखर भी अच्छे-अच्छे घर वापस आ जायें।
-साधना छिरोल्या
दमोह(म.प्र.)
