बहुत हुआ अत्याचार कि चुप्पी तोड़ दे अब
घुट-घुट जीना बेकार कि चुप्पी तोड़ दे अब
तू नम्र ह्रदय सी कोमल पावन पवित्र सी निश्चल
नहीं होगी दरिंदगी का शिकार कि चुप्पी तोड़ दे अब
ख्वाहिशों पे लगी ज़ंग कहीं खो सी गयी हूँ
भीतर अरमान हज़ार कि चुप्पी तोड़ दे अब
दहलीजों में कैद व्यर्थ सीमाओं में बंधी
बंद हो साजिशों का व्यापार कि चुप्पी तोड़ दे अब
दायित्वों के संकल्प को तूने संपूर्ण निभाया
कुछ तेरे भी अधिकार कि चुप्पी तोड़ दे अब
पुरुषों पर दोष नहीं सारा महिलाएं भी हैं
नारी हो नारी पर करती वार कि चुप्पी तोड़ दे अब
चलो आज उठाएं संकल्प हम -तुम
न सहेंगे न सहने देंगे अत्याचार कि चुप्पी तोड़ दे अब
-उमा पाटनी ‘अवनि’
