टप-टप बूँदें बरस रही हैं,
सिहरा हुआ वन-उपवन है।
भीगी डाल पर बैठा लेकिन,
एक सुखी सा परिवार है।
एक सलेटी, एक केसरिया,
दो पंखों का घर बनाया।
दुनिया की सारी बारिश को,
अपने में समेट छुपाया।
नन्हे-नन्हे दो सपने हैं,
पंखों तले दुबके सारे।
माँ की ममता, पिता का संबल,
इनसे बड़े न पहरेदार।
बाहर तूफाँ कितना भी हो,
भीतर केवल प्यार पले।
जहाँ अपनापन बाँहें खोले,
वहाँ दुःख भी हार चले।
दुबके बैठे हैं नन्हे नन्हे पंछी
सुकून की छाँव तले,
मानव हो या पशु पंछी
ममता से ही संतान पले।
ये तस्वीर केवल नहीं है,
हर घर का सार यही है।
माता-पिता की छाया में ही,
बच्चों का संसार सही है।
-मंजू सरावगी मंजरी
रायपुर (छत्तीसगढ़)
