जब थाम लिया है हाथ तेरा,
तो मंज़िलें भी मुस्कुराने लगीं।
अंधेरों में भी दीप जले,
और राहें खुद गुनगुनाने लगीं।
गिरते-गिरते संभल गया मैं।
तेरे भरोसे का बल मिला।
हर मुश्किल आसान लगी,
और हर समस्या का हल मिला।
तब डर कैसा,और गम कैसा,
जब संग मेरे तू चलती थी।
अब सब सपने खुद जीता हूँ।
तेरी कमी अब खलती है।
खैर!नहीं तू अब पास नहीं।
पर छोड़ा नहीं है हाथ मेरा।
अब भी विश्वास यूँ चलता है।
जब थाम लिया है हाथ तेरा।
-आनंद पाण्डेय “केवल”
