हो गए दिवाकर कुपित गगन।
जल रही तपिश से सकल धरा।
हो गई जेठ की तपन असह,
व्याकुल वसुधा पर जन जीवन।
रवि की किरणों का रौद्र रुप,
होता है देख व्यथित तन मन।
खग मृग अधीर कानन में है,
किंचित भर सुखमय ठांव नहीं।
हो उठे व्यग्र सब जीव जगत,
शीतल तरुवर की छांव नहीं।
अधरों पर ठहरी प्यास अमिट,
इस प्रबल ताप से विकल धरा।
हो गए दिवाकर कुपित गगन,
जल रही तपिश से सकल धरा।
सूखे वन, बाग, तड़ाग सभी,
वसुधा का आंचल मुरझाया।
खलिहान,खेत की हरियाली
झुलझी, मजदूर, कृषक काया।
मानव ने दोहन किया स्वयं,
नैसर्गिक, प्रकृति की काया।
वसुधा पर ज्वाला धधक रहीं,
परिणाम उसी का है पाया।
मायूस कृषक खलिहान देख,
खेतों की सूखी फसल धरा।
हो गए दिवाकर कुपित गगन,
जल रही तपिश से सकल धरा।
फिर से धरती पर रोपित हो,
वृक्षों से सुरभित वन हजार।
जन जन को पुनः समझना है,
करुणामय अचला की पुकार।
जिस माटी में हम पले बढ़े,
कुछ कर्ज चुकाना है हमको।
हरियाली से फिर सजे धरा,
यह फर्ज निभाना है हमको।
कम करो दिवाकर ताप क्रूर,
मानो जलती हो अनल धरा।
हो गए दिवाकर कुपित गगन,
जल रही तपिश से सकल धरा।
-सीमा शुक्ला
अयोध्या (उत्तर प्रदेश)
