ज़िन्दगी का है सफर हर मोड़ पर श्मशान है
कर्म की गठरी को लादे चल रहा इंसान है
कब तलक चलता रहेगा आँधियों का सिलसिला
दूर कितना और बाकी मौत का तूफान है
ठोकरों पर ठोकरें है राह में काँटे बिछे
औ’ संभल के हौसलों से आदमी अंजान है
धड़कने भी मंद है साँसों का कोलाहल रूका
क्यों हलक में आज अटकी आदमी की जान है
बाँस दो नौ कमचियों पे घास का बिस्तर सजा
इक कफन लिपटा बदन पर आखिरी सामान है
शाम की आगोश में दिनकर को हासिल है सजा
रौशनी की हर किरन का हो रहा अवसान है
-दिनकर राव दिनकर
