आज मजदूर दिवस पर…
मैं लिखूँगा दर्द ग़म जी भर लिखूँगा
खूँ पसीने से भरे अक्षर लिखूँगा
ज़िन्दगी मजदूर की क्या ज़िन्दगी है
मौत से जिसको यहाँ बदतर लिखूँगा
हर घड़ी धुँआ उगलती चिमनियों में
है बदन इंधन बना अक्सर लिखूँगा
कारखाने बंद तो फाकापरस्ती
भूख भी बच्चों की मैं खुलकर लिखूँगा
वक़्त पे दो रोटियाँ मिलती नहीं है
पेट भर पानी यहाँ पीकर लिखूँगा
है दिहाड़ी पे लगा दिनकर भी देखो
है अँधेरे रात भर नश्तर लिखूँगा
-दिनकर राव दिनकर
