बरसों से दिल में बसी हूक को जगा!
ख़ुदा रोज फरिस्तों को यही नया पैगाम देतें हैं।
प्यार करने वाले नहीं करतें हैं दगा!
बेबसी में किश्तों को रोज नया आयाम देते हैं।
तेरी हँसी में कितनों की जान है फसी?
तुझे मालूम नहीं है सुन ओ नरगिसी!
रात लिखी ग़ज़ल पढ़,सुबह देते हैं जगा!
लोग तेरे मेरे रिश्ते को,एक नया नाम देते हैं।
लुढ़की बोतलों,और टूटे प्यालों की हॅंसी,
हमें याद दिलाती है,मयकसों की बेबसी।
महफ़िल में हर शख्स रहे,ठगा सा ठगा,
साकी-सगा नहीं मण्डेला,तो भी सलाम देते हैं।
-सत्येन्द्र मण्डेला
