जिंदगी को अक्सर एक विस्तृत, अनंत कैनवास की तरह देखा जाता है। जब हम जीवन के शुरुआती दौर में होते हैं, तो हमें लगता है कि हमें इस कैनवास को जल्द से जल्द कुछ गिने-चुने, चटक रंगों से भर देना है—एक सफल करियर, परिवार और समाज में एक मुकाम। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता है, हम यह समझने लगते हैं कि जीवन का यह कैनवास कभी खत्म नहीं होता, और न ही इस पर उकेरे जाने वाले मौकों के रंग कभी कम पड़ते हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में दो-ढाई दशक बिताने के बाद, जब मैंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) लेने का निर्णय लिया, तो मन के किसी कोने में एक धुंधला-सा प्रश्न था—क्या मेरे कैनवास के मुख्य रंग अब समाप्त हो गए हैं? कक्षाओं की वह चिर-परिचित चहल-पहल, विद्यार्थियों के सवालों की गूंज और एक तय दिनचर्या के बिना, क्या अब यह कैनवास सूना हो जाएगा?
लेकिन, यह मेरी एक बहुत ही मानवीय और साधारण-सी भूल थी।
जीवन के कैनवास की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि जब हम एक चित्र पूरा करते हैं, तो वह हमें एक नया, अछूता हिस्सा थमा देता है। जैसे ही मैंने पेशेवर जिंदगी की एक लंबी पारी को विराम दिया, वैसे ही मेरे सामने कई नए झरोखे खुल गए। यह महसूस हुआ कि मौके केवल नौकरी या करियर की सीढ़ियां चढ़ने का नाम नहीं हैं; मौके तो खुद को फिर से गढ़ने और अपनी उन रुचियों को जीने का नाम हैं, जो कहीं समय के अभाव में दब गई थीं।
आज जब मैं अपनी कलम उठाती हूँ, तो शिवानी जी के उपन्यासों में सामाजिक मनोविज्ञान तलाशते हुए जो दृष्टि मैंने वर्षों पहले विकसित की थी, वही मुझे आज समाज की विसंगतियों पर ‘आकलन का ठेका’ जैसे व्यंग्य या ‘सपनों के बीज’ जैसी कविताएं लिखने की नई ऊर्जा देती है। यह एक नया मौका ही तो है—बिना किसी तय पाठ्यक्रम के, अपने विचारों को स्वतंत्र रूप से अभिव्यक्त करने का मौका। नई पीढ़ी को ऑनलाइन माध्यमों से हिंदी सिखाने की रूपरेखा तैयार करना मुझे यह बताता है कि ज्ञान बांटने के तरीके बदल सकते हैं, लेकिन अवसर कभी समाप्त नहीं होते।
स्वामी ए. पार्थसारथी जी के वेदांत दर्शन का अध्ययन करते हुए एक बात जो भीतर तक गहराई से उतरी है, वह यह है कि हमारी अपनी दृष्टि ही हमारे अवसरों का निर्माण करती है। जब हम बाहरी भागदौड़ से जरा रुककर भीतर की ओर मुड़ते हैं, तो जीवन के कैनवास पर आध्यात्मिक शांति और आत्म-मंथन का एक नया, गहरा रंग उभरने लगता है। ऋषिकेश के उन शांत दिनों में बिताया गया समय हो या हर शनिवार की जाने वाली दार्शनिक चर्चाएं—ये सभी जीवन को एक नए दृष्टिकोण से देखने के अवसर ही हैं।
अक्सर हम उम्र या परिस्थितियों को मौकों के अंत के रूप में देखने लगते हैं। पर सच तो यह है कि जब तक हमारे हाथ में अनुभव की तूलिका है और मन में कुछ नया रचने की इच्छाशक्ति, तब तक जिंदगी के इस कैनवास पर कभी भी जगह कम नहीं पड़ सकती।
हर नई सुबह एक नया रंग है, और हर अनुभव एक नया ब्रश-स्ट्रोक। जरूरत है तो बस इस विश्वास की कि जीवन के कैनवास में मौकों की कभी कमी नहीं होती; कमी होती है तो बस कभी-कभी हमारे देखने के नजरिए की। कैनवास तो हमेशा तैयार है, बस हमें अपने नए रंग चुनने हैं।
-डॉ संगीता बिंदल
