विधना के एक इशारे पर
मानवता दहल गई सारी,
लेकिन मानव की जिजीविषा
पल भर भी हिम्मत कब हारी।
धरती डोली, हड़कंप मचा,
दाता ने यह भूकंप रचा।
भय, शोक, करुण-चीखें, पुकार
मानव मन काँपा बार-बार।
क्षण भर में भीषण वज्रपात,
धन-जन हानि और प्राणघात।
लेकिन अगले ही पल मानव
भरकर भीषण हुंकार उठा।
जो चला गया, उसको तजकर
कर जीवन का सत्कार उठा।
दुनिया हर वर्गभेद भूली,
मानवता की आशा फूली।
हर दिशा सहायक हो आई,
ज़ख्मों का मरहम ले आई।
मनुपुत्र मिलाकर ताल चले,
अब कैसा भी भूचाल चले।
हम फिर से गाँव बसा लेंगे,
छप्पर से छाँव जुटा लेंगे।
ईश्वर! तेरे सुत दीन नहीं,
भय से हारें, वे हीन नहीं।
कल फिर से सृजन करेंगे हम,
फिर तेरा भजन करेंगे हम।
-चिराग़ जैन
