नदिया तट पर खोयी सुध बुध, सोच रही हूं
जीवन भी तो एक नदी है, नियति यही बस बहते जाना।
जल क़ी बूंद-बूंद अमृत बन, बनती जीवन धारा,
विश्वासों का दीप जलाकर, स्नेह-समर्पण सारा।
संध्या की लाली में खिलता उम्मीदों का सूरज,
जीवन नौका पार ले चली दूर बहुत है किनारा।
गंगा मैया हर लेना तुम, सारा कलुष हमारा,
करूँ अर्चना उस माटी की, कर पावन स्पर्श तुम्हारा।
लहरों सा चंचल मन मेरा, धड़कन जल की धारा,
स्वप्न भंवर से मन को छलते, तुम ही एक सहारा।
मुझे बुलातीं हैं स्मृतियाँ, स्नेहिल संसार तुम्हारा,
जीवन की शाश्वत गति खोकर,..
जब राह मुक्ति की पाऊं,
तेरे आँचल की छाया हो, चिर निद्रा में सो जाऊं।
-पद्मा मिश्रा
जमशेदपुर
