जो उनको हो स्वीकार बात तो, अहसासों के गीत लिखूं
लिख दूँ उनको नील कमल और अपने मन का मीत लिखूं
पूर्ण चन्द्र-सा चेहरा लिख दूँ, और आंखों को मयखाना
मोती जैसे दशन लिखूं और, अधरों को मय पैमाना
श्याम घटा जुल्फों को कह दूं, कर को लिख दूँ कमल समान
उरु को लिख दूँ केल तरु औ”, भौंहें जैसे तीर कमान
उनको जो स्वीकार नहीं तो, मन मे कोई खेद नहीं
जो कहनी थी, कह दी मैंने, मेरे दिल में भेद नहीं
निर्णय अब उनको करना है, कह दे वो भी दिल की बात
मैंने तो कह दी है अपनी, पता नहीं उनके जज्बात।
-हनुमान सहाय
